Monday, 25 March 2013

ऐसा भी होता है....


हमारे समाज में शुरू से ही लड़के और लड़कियों के बीच भेदभाव किया जाता रहा है। हमारी सोच भले ही आधुनिक हो गयी हो लेकिन हम अपनी सोच से इस भेदभाव को मिटा नहीं पाये हैं। हर कदम पर ये भेदभाव और दो तरह का व्यवहार देखने को मिल जाता है। लड़कियों को हर कदम पर रोका जाता है कि वो लड़कों की बराबरी नहीं कर सकतीं। लड़कियों, महिलाओं पर हमेशा ही अत्याचार किये जाते हैं। हमारा समाज पुरूष प्रधान है इस वजह से हमेशा लड़कों का पक्ष लिया जाता है। कई ऐसे उदाहरण भी देखने को मिल जाते हैं जो इस बात को सही साबित भी कर देते हैं। और इन उदाहरणों को देखते देखते हम अपनी सोच में यह बिठा भी चुके हैं कि लड़कियां, महिलाएं अबला होती हैं और पुरूष उनका शोषण करते हैं। समाज में लड़कियों के साथ हो रहे भेदभाव के कारण ही हमारी सरकारों ने भी समय समय पर उनके हित में कई कानून बना डाले हैं। लड़कियां भी इस बात को अच्छी तरह से समझ चुकी हैं कि अब उनके पास कौन कौन से अधिकार हैं और वो उन अधिकारों का प्रयोग कर क्या क्या कर सकती हैं ? लेकिन इन सब का सकारात्मक परिणाम कितना हुआ है यह कह पाना मुश्किल हैं। सरकार के जो कानून महिलाओं को शोषण से बचाते हैं, उनका कितना इस्तेमाल वैसी महिलाएं कर रहीं हैं जो शोषित हैं, यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है। अब दहेज प्रथा उन्मूलन कानून का ही उदाहरण ले लें। आज के वक्त में शायद ही कोई ऐसा हो जिसे दहेज प्रथा से संबंधित कानून की जानकारी न हो। फिर भी अक्सर दहेज के कारण जलती लड़कियों के बारे में समाचार पत्रों और टीवी रेडियो पर देखने या सुनने को मिल जाता है। क्या दहेज के लिए लड़कियों को मारने वाले इस कानून के बारे में नहीं जान रहे हैं ? या जिनकी लड़कियां दहेज के लिए मार डाली जाती हैं, वे इस कानून के बारे में नहीं जान रहे हैं ? ये संभव नहीं जान पड़ता है। अक्सर यह देखा गया है कि समाज के एक अनजाने भय के कारण ज्यादातर ऐसे मामले दबा दिये जाते हैं। लड़कियों को सहने (प्रताडि़त होने) के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। लेकिन अब लड़कियां जागरूक होने लगी हैं। वे इस अत्याचार को भला क्यों सहें ?
महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के बढ़ते ग्राफ ने महिलाओं को एक रक्षात्मक कवच प्रदान कर दी है। अब महिलाएं अपने लिए बनाये गये कानून का सहारा लेने लगी हैं। और अत्याचारियों पर कानून का डंडा बरसाने लगी हैं। लेकिन ये डंडा कई बार बेगुनाहों पर भी बरबस चल पड़ता है। पटना के जिला सत्र न्यायालय के एक प्रतिष्ठित वकील की मानें तो आज कोर्ट में ज्यादातर मामले धारा 498 (दहेज प्रथा) से संबंधित होते हैं। जिनमें अधिकतर मामले फर्जी होते हैं। दहेज प्रथा उन्मूलन कानून ने महिलाओं को इतनी ताकत दे दी है कि अब वे इसका गलत फायदा उठाने लगी हैं। ससुराल वालों को परेशान करने तथा ससुराल में अपनी धौंस बनाये रखने के लिए महिलाएं धड़ल्ले से दहेज प्रथा का मुकदमा दर्ज करवाने लगी हैं। मुकदमे की सच्चाई चाहे जो भी हो, तत्काल तो ससुराल वालों को परेशानी उठानी ही पड़ती है। कई बार तो जेल तक जाने की नौबत आ जाती है।
अब ऐसे में तो यही लगता है कि महिलाएं अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार रही हैं। पहले जहां दहेज उत्पीड़न के मामलों में वर पक्ष के सभी सदस्यों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता था वहीं अब केवल लड़के पर ही मुकदमा दर्ज किया जाने लगा है। वर पक्ष के लिए यह रियायत सर्वोच्च न्यायालय ने शायद इसी आधर पर दिया होगा कि इन मामलों में सत्यता कम रह गयी है। यह बदलाव यही दर्शा रहा है कि आज की महिलाएं भले ही दहेज उत्पीड़न का डंडा अपने ससुराल वालों को भयभीत रखने के लिए चला रहीं हैं परंतु सच्चाई यह है कि दहेज उत्पीड़न के उन मामलों सच्चाई ही नहीं रह गई है। इससे तो नुकसान फिर से महिलाओं का ही हो रहा है। अब इसे कोई कैसे समझाए ? आज फिर से मुझे वो कहावत याद आ रही है: औरतें ही औरतों की दुशमन होती हैं।।

Tuesday, 17 April 2012

ये कैसी आस्था ??


भारत प्रारंभ से ही आस्था का केन्द्र रहा है। यही एक मात्र ऐसा देष है जहां करोड़ों की संख्या में देवी-देवता पूजे जाते हैं। देवी देवताओं के साथ ही यहां संत महात्माओं की भी कमी नहीं है। यहां कुछ ऐसे भी संत महात्मा हुए हैं जिन्होंने अपनी सादगी और चामत्कारिक गुणों से न केवल संसार को अचंभित किया बल्कि आमजन को सुखी जीवन जीने की सही राह भी बतलाई। वक्त बदला और संत महात्माओं का चोला भी। चोला बदलने से तात्पर्य उन संत महात्माओं से है जिन्होंने न केवल लोगों की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया बल्कि अपने लिए अथाह संपत्ती भी जमा की। जब तक ये जीवित रहे, दुनिया को भ्रम में रखा लेकिन इनकी मृत्यु के बाद जब इनका सच सामने आये तो लोग खुद को ठगे से महसूस करने लगे। इसके अलावा और कर भी क्या सकते हैं ?
यहां के लोग किसी पर भी बहुत जल्द विश्वास कर लेते हैं। विश्वास की सीमा तब हद पार कर जाती है जब पढ़ा लिखा बुद्धीजीवी तबका भी आधुनिक बाबाओं की जय जयकार करने लग जाता है। यही कारण है कि आये दिन बाबागिरी के नाम पर ठगी करने वालों का भांड़ाफोड़ होने के बावजूद भी बाबागिरी का धंधा हमेशा चलता रहता है।
इन दिनों टीवी चैनलों, चैक-चैराहों यहां तक की मोबाईल में भी निर्मल बाबा छाये हुए हैं। निर्मल बाबा उर्फ निर्मलजीत सिंह नरूला के भक्तों की संख्या दिन प्रतिदिन तेजी से बढ़ती जा रही है। इनके भक्तों की टोली में समाज का हर तबका अपनी सुधबुध खोकर शामिल हो रहा है। मंहगे काले रंग के पर्स रखना, ब्रांडेड सामानों का इस्तेमाल करना, मंहगी लिपिस्टिक का प्रयोग, दशवंत निकालना बाबा के आम नुस्खे हैं। जिनका प्रयोग बाबा भक्त करते हैं। निर्मल बाबा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाबा के द्वारा समागम में तो हजारों की संख्या में लोग भाग लेते तो हैं ही साथी एक बड़ा तबका टीवी के सामने बैठा भी बाबा के कारनामों को देख सुन रहा होता है और जैसा बाबा कहते हैं वैसा करता है। बाबा के भक्तों का मानना है कि ऐसा करने से बाबा बरकत देते हैं। उनके बिगडे काम भी बन जाते हैं। बाबा पर विश्वास करने वाले लोग कहते हैं कि उन्होंने जो भी बाबा से पूरी आस्था और विष्वास के साथ मांगा वो उन्हें मिला। बाबा पर उनका अटूट विष्वास है, बाबा जैसा कहते हैं वो वैसा ही करते हैं।
बात यहीं पर आकर अटक जाती हैं। विश्वास, अटूट विश्वास। मैं कुछ वर्ष पूर्व की एक घटना का उल्लेख करना चाहूँगा, जब गर्मी के महीने में शिवलिंग ने दूध पीना शुरू कर दिया था। हजारों-लाखों की संख्या में लोग शिवलिंग को दूध पिलाने के लिए उमड़ रहे थे। ऐसे में एक मोची ने भी अपने जूते सिलने वाले तिकोने औजार को दूध पिलाकर यह जता दिया कि कण-कण में भगवान है। बस आस्था होनी चाहिए। राॅन्डा बर्न की एक किताब द सीक्रेट में इस बात का जिक्र है कि हमारी जिसपर जितनी आस्था होती है उसी अनुरूप वो हमारी मांगों को पूरा करता है। यही वजह है कि पत्थर की मूरतें भी मन्नतें पूरा करती हैं। निर्मल बाबा भी इसी सिद्धांत को अपना कर अपना धंधा चला रहे हैं। वो लोगों को जो कहते हैं लोगों को उन बातों पर पूरा विश्वास होता है कि उनके ऐसा करने से उनके रूके हुए काम होने लगेंगे। उनकी मन्नतें पूरी होने लगेंगी। और वाकई में ऐसा होता भी है। क्योंकि यह तो प्रकृति का सिद्धांत ही है। अगर आप खुश रहना चाहेंगे तो खुश रहेंगे। बिल्कुल उसी तरह जैसे आप जब तरक्की चाहेंगे तो आपकी जरूर मिलेगी। निर्मल बाबा भी बस यही कर रहे हैं। और इसके एवज में लोगों से मोटी रकम वसूल रहे हैं। यदि वाकई में उनके पास कोई दैवी चमत्कार है तो ऐसे कौन से देवी देवता है जो केवल काॅरपोरेट घरानों के लिए होते हैं। निर्मल बाबा के दर्षन केवल उन्हीं लोगों को हो सकते हैं जो इसके एवज में न्यूनतम 2,000/- (दो हजार रूपये) खर्च कर सकते हैं। बाबा के भक्तों का कहना है कि गरीब टीवी पर बाबा की कृपा पा सकते हैं तो ऐसा लगता है जैसे बाबा के भक्त भी हमारी केन्द्र सरकार की तरह ही उन्हें गरीब नहीं मानती जो रोजाना 32 रूपये कमाते हैं।
खैर, निर्मल बाबा के कार्यक्रमों और हो रही घटनाओं को देखकर तो ऐसा ही लगता है कि निर्मल बाबा के भक्तों का इससे कल्याण हो या न हो लेकिन निर्मल बाबा का कल्याण जरूर हो रहा है।

Sunday, 11 December 2011

ये कैसी आजादी...

इन दिनों भारत के संचार मंत्री कपिल सिब्बल की विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साईट्स के प्रमुखों के साथ बैठक को मीडियाकर्मियों के द्वारा प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से आड़े हाथों लिया जा रहा है। हालांकि किसी भी न्यूज चैनल या समाचार पत्र के द्वारा इसका इतना विरोध नहीं हो रहा है जितना सोषल नेटवर्किंग साईट पर। फेसबुक, ट्विट्र जैसे नेटवर्किंग साईट्स पर अभी यह मुद्दा काफी जोर-शोर से उठाया जा रहा है कि सरकार फिर से आपातकाल की स्थिति लागू करने पर आमादा है। संचार मंत्री के सोशल नेटर्विंग साईट के प्रमुखों के साथ बैठक के बारे में कहा जा रहा है कि वो सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर दबाव बनाकर काँग्रेस और काँग्रेसी नेताओं के विरूद्ध चलाये जा रहे अभियान को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। इसी के तहत काॅग्रेस के खिलाफ मौजूद सबसे बड़े पेज/कम्युनिटी ‘‘..... अगेन्टस काँग्रेस’’ को हटा दिया गया है। हालांकि इसके पक्ष में कपिल सिब्बल का कहना है कि ‘साईट पर पोस्ट की जाने वाली सामग्रियों से बहुत से समुदायों की धार्मिक भावना और गणमान्य लोगों के सम्मान को ठेस पहुंच रही है।’ कपिल सिब्बल का यह वक्तव्य कहीं न कहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की ओर इशारा कर रही है। और इसी बात को लेकर हाय-तौबा मची हुई है।
हाय तौबा मचाने वाले शायद इस बात को भूल रहे हैं कि वह जिस तरह से काँग्रेस और काँग्रेसियों का विरोध कर रहे हैं क्या वह सही है ? भारत का विदेशों में प्रतिनिधित्व करने वाले मनमोहन सिंह को ‘सोनिया का दमाद’, कपिल सिब्बल को ‘काबिल चप्पल’, दिगविजय को ‘पिगविजय’ कहना कहां तक उचित लगता है। क्या हम अपनी संस्कृति भूल कर नेताओं की परिपाटी पर ही नहीं चल निकले हैं। विरोध करना गलत नहीं है पर क्या विरोध का यह तरीका सही है ? चुनाव के समय जब नेताओं के द्वारा एक दूसरे के लिए इस तरह के शब्दों का प्रयोग किया जाता है तो उस समय हम इसका विरोध करते हैं, कहते हैं हमारे नेताओं को ये भी पता नहीं होता होता कि किस तरह के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए ? और आज हम खुद यही कर रहे हैं और अगर कोई इसे गलत कहता है तो उसके लिए हाय-तौबा मचाने लग जाते हैं ?
हमारे संविधान में अनुच्छेद 19(1) के तहत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गयी है। परंतु यह आजादी अनिर्बन्धित नहीं है। अनुच्छेद 19(2) में यह प्रावधान किया गया है कि विशेष परिस्थितियों मे सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित भी कर सकती है। इन विशेष परिस्थितियों में शिष्टाचार व सदाचार को भी शामिल किया गया है। हम वहीं तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग कर सकते हैं जबतक कि वो शिष्टाचार के दायरे में हो। और अभी विरोध को जो तरीका अपनाया जा रहा है वो कहीं से भी भारतीय शिष्टाचार के दायरे में नहीं आता। अतः सरकार अगर चाहे तो ऐसी आजादी पर पाबंदी लगा सकती है। लेकिन इस निमित्त भी संविधान को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार अपनी मर्जी से इस तरह के किसी प्रतिबंध को लागू नहीं कर सकती। अनुच्छेद 19(2) में यह भी वर्णित है कि प्रतिबंध केवल कानून बनाकर ही लगाये जा सकते हैं। केवल प्रशासनिक आधार पर अभिव्यक्ति की आजादी को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है।
एक तरफ से देखा जाए तो सरकार की गतिविधियों पर पर नजर रखना और उसका विरोध करना लोकतंत्र के सफलता के लिए सही है। लेकिन सरकार के हर कदम का, बिना सोचे-विचारे विरोध करना केवल मूर्खता ही कही जा सकती है। किसी भी देश का आत्मसम्मान वहां के नागरिकों को इसकी धज्जियां उड़ाने की अनुमति नहीं दे सकता। ऐसी स्थिति से बचने के लिए चीन और रूस जैसे अनेकों विकसित देषों में कई साइट पर पूर्णतः रोक लगा दी गई है। अतः भारत के सम्मान को बचाने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए इस कदम का पूर्ण रूप से विरोध करना अतार्किक और बचकाना होगा।
फिलहाल सोशल नेटर्किंग साईट्स ने धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले पोस्ट्स पर लगाम लगाने की बात तो स्वीकार ली है पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पूरी से रोकने की केन्द्र सरकार की कोशिश को नकार दिया है।

Friday, 21 October 2011

आस्था का बिगड़ता स्वरुप

किताबों में मैंने पढ़ा था, धर्म का अर्थ है आचरण। हम जैसा आचरण करते हैं वही हमारा धर्म होता है। लेकिन आजकल अपने आस पास की स्थिति देखकर ऐसा लगने लगा है कि धर्म की पूरी अवधारणा ही बदल चुकी है। आज धर्म केवल कुछ दिनों के लिए संयमित आचरण तक ही सीमित रह गया है।  इस संयमित आचरण को भी हम अपने सुविधानुसार संशोधित करते रहते हैं।
हिन्दुओं में वैसे तो सालों भर कोई न कोई धार्मिक क्रियाकलाप होता रहता है लेकिन सावन महीने के बाद से इसमें अचानक से इजाफा हो जाता है। हर सप्ताह कोई न कोई पर्व या धार्मिक अनुष्ठान होता है। और इसी के साथ शुरू हो जाता है संयमित आचरण। बहुत लोग सावन के महीने में मांसाहार का त्याग कर देते हैं। और पूरी तल्लीनता से भगवान शंकर की आराधना में जुट जाते हैं। हालांकि इस महीने में भी मादक द्रव्यों का सेवन करने वाले मादक द्रव्यों का सेवन करते ही हैं और यह तर्क देते हैं कि ये भगवान शंकर का प्रसाद है। संयमित आचरण दशहरा और छठ के दिनों में भी देखने को मिलता है। जो लोग पूजा पाठ नहीं करते हैं वो भी सादा भोजन ही करते हैं। मांसाहार तथा मादक द्रव्यों का सेवन पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाता है। एक बार फिर से संयमित जीवन शुरू। इस बार यह संयमन केवल कुछ दिनों का ही होता है। लेकिन जैसे ही संयमित आचरण में रहने की अवधि पूरी होती है, फिर से अपने पूर्ववत आचरण में जुट जाते हैं।
विजयादशमी के दिन जब मैंने बुचर शॅपस पर भीड देखी तो अनायास ही मुंह से निकल गया, ‘‘बहुत सह लिए दस दिन’’। दुकानों के आगे मांसाहारियों की भीड़ लगी हुई थी। कोई आज के दिन इस मौके को नहीं खोना चाहता था। 9 दिनों तक बहुत सहन कर लिया, अब सहा नहीं जाता। आज तो टूट पड़ेगे। इस दृश्य को देखकर ऐसा लगा कि क्या हम केवल दिखावे के लिए ही धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। मन से कभी भी उन नियमों का पालन नहीं करते जो हमारे सरल व सादा जीवन जीने के लिए बनाये गये हैं।
धार्मिक क्रियाकलापों को आज सभी अपने अपने ढंग से परिवर्तित कर रहे हैं। पूजा कराने आये पंडित जी भी किसी वस्तु के अभाव में सहज ही मंत्र पढ़ देते ........ अभावे अक्षतम् समर्पयामी। पंडित जी हर परिस्थिति में खुद और देवाताओं को भी ढाल लेते हैं मानो भगवान इनके कहे अनुसार ही चलते हैं। लोगों की इनके प्रति इतनी आस्था कि पंडित जी ने कहा है नहीं कैसे करेंगें। नौकरी न लग रही हो, षादी न हो रही हो, पारिवारिक कलह हो, वगैरह-वगैरह, हर समस्या का समाधान पंडित जी के मंत्रों और बताये उपायों में होता है। इन दिनों खबरिया चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं को भी लोगों में बढ़ रही दिखावटी आस्था की गंध लग गयी है। जिस कारण जहां लगभग हर टीवी चैनल हर रोज एक निश्चित समय पंडितों के नाम करने लगे हैं। वहीं पत्र-पत्रिकाओं में भी एक निश्चित स्तंभ पंडित जी के लिए होता है। आज का पढ़ा लिखा नवयुवक वर्ग भी आंखें मूंदे इस ओर बढ़े जा रहा है। रंग बिरंगे पत्थरों वाले अंगूठी पहनना तो अब चलन सा बन गया है। इन सबों में धर्म कहां पीछे छूटता जा रहा है इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं। कहीं न कहीं आज धर्म फिर से अंधविश्वास का रूप लेता जा रहा है। हम बिना सोचे समझे ऐसे धार्मिक क्रियाकलापों को किये जा रहे हैं जो अर्थहीन हैं। अब पंडित जी ने कह दिया कि किसी खास रंग के कपड़े पहनो, समय बदलेगा और हम लग जाते हैं उस उटपटांग काम को करने में।
हिन्दू धर्म को बहुत हद तक वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित कहा गया है। और कहीं न कहीं हर क्रियाकलाप वैज्ञानिकता की छांव में रहता है। पर उसमें अपने अनुरूप संसोधन कर हम उसे धार्मिक अंधविश्वास में बदल रहे हैं। ऐसे में धर्म के लिए भी यह जरूरी है कि एक बार फिर से बौद्धिक वर्ग आगे आये और अंधविश्वास में बदल रहे धर्म की रक्षा करे। आधुनिकता और धर्म के बीच सामंजस्य स्थापित कर फिर से धर्म की श्रेष्ठता को बाह्य आडंबरों से मुक्त कर सके।

Saturday, 1 October 2011

कुंध होती मानवीय संवेदनायें

डॉक्टर को धरती का भगवान माना जाता है। लोगों की जो अपेक्षाएं भगवान से होती हैं उन अपेक्षाओं को लगभग पूरा करने का काम डॉक्टर ही करते हैं। लेकिन व्यावसायिकता के इस दौर में डॉक्टरी का पेशा भी पूरी तरह व्यावसायिक हो चुका है। आज शायद ही कोई ऐसा डॉक्टर हो जिसे मरीजों की फिक्र हो। हालांकि ज्यादातर डॉक्टरों का मरीजों के प्रति व्यवहार अभी भी सहानुभूतिपूर्ण ही होता है। लेकिन ये सहानुभूति तभी तक होती है जबतक मरीज या उसके परिजन डॉक्टर साहब की छत्रछाया केबिन में हों।
हम विकास के दौर में जैसे जैसे आगे बढ़ रहे हैं नई नई बीमारियों से भी हमारा पाला पड़ता जा रहा है। कैंसर एड़स हेपेटाइटिस जैसी बीमारियां तो अब आम हो चुकी हैं। नई बीमारियांे के इस दौर में न्यूरो सर्जनों की भी खूब चल निकली है। छः महीने के बच्चे से लेकर उम्र के आखिरी पड़ाव में चल रहे वृद्ध भी इनके मरीजों की फेहरिस्त में शामिल होते हंै। ज्यादातर न्यूरो सर्जन तो ऐसे हैं जिनके यहां दो-दो, तीन-तीन दिन का सफर तय कर मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। न्यूरो सर्जनों के यहां बढ़ रही भीड़ और व्यस्तता के कारण मरीजों को दिखाने की बारी 30-45 दिनों पर आती है। हद तो तब हो जाती है जब काफी इंतजार के बाद मरीज को डॉक्टर साहब से मिलने की बारी आती है और डॉक्टर साहब अपने किसी निजी काम से मरीजों को समय नहीं दे पाते। उस समय मरीजों को फिर से नई तारीख दी जाती है जो दुबारा 30-35 दिनों का इंतजार कराती है। ऐसे में मरीजों का क्या होगा, इसकी जरा सी भी परवाह शायद डॉक्टरों को नहीं रहती। उन्हें तो बस अपनी बेतहाशा कमाई से मतलब होता है। डॉक्टर मोटी कमाई की बदौलत अपनी जमा पूंजी बढ़ाने में लगे हैं वहीं दूसरी ओर मरीज अपने खून पसीने की कमाई को भी पानी की तरह बहा रहे है।
ऐसे सुविख्यात डॉक्टरांे के यहां डॉक्टरों से ज्यादा उनके कंपाउंडरों की तूती बोलती है। डॉक्टर साहब शायद समय दे भी दें पर ये कंपाउंडर साहब नहीं चाहेंगे मजाल क्या है कि आप उनसे मिल लेंगे। ऐसे में मरीजों का धरती के इस भगवान पर से भरोसा उठने लगता है। मरीज या तो दर दर की ठोकर खाने को विवश हो जाते हैं या फिर उनकी बीमारी उन्हें उस भगवान के पास पहुंचा देती है जिसका दूत उन्हें अपनी शरण में नहीं ले रहा होता है।
कमोबेश ऐसी स्थिति हर डॉक्टर के यहां देखने को मिलती है। और ये स्थिति देखकर बरबस ही यह भाव जाते हैं कि हम किस ओर जा रहे है। पहले जिन्हें हम धरती के भगवान का दर्जा देते थे उन्हीं से अब सबसे ज्यादा बैर रखने लगे हैं। आये दिन मरीज के परिजनों और डॉक्टरों के बीच हाथापाई की घटनाएं सामने आने लगी है। जिससे डॉक्टर और मरीजों के बीच के संबंध दिन पर दिन बिगडते चले जा रहे हैं। व्यवसायिकता और धनलोलुपता की इस अंधी दौड़ ने मानवीय संवेदनाओं के उपर मोटी परत चढा दी है। निसंदेह यह मानवता के हित में नहीं है।