Monday, 25 March 2013

ऐसा भी होता है....


हमारे समाज में शुरू से ही लड़के और लड़कियों के बीच भेदभाव किया जाता रहा है। हमारी सोच भले ही आधुनिक हो गयी हो लेकिन हम अपनी सोच से इस भेदभाव को मिटा नहीं पाये हैं। हर कदम पर ये भेदभाव और दो तरह का व्यवहार देखने को मिल जाता है। लड़कियों को हर कदम पर रोका जाता है कि वो लड़कों की बराबरी नहीं कर सकतीं। लड़कियों, महिलाओं पर हमेशा ही अत्याचार किये जाते हैं। हमारा समाज पुरूष प्रधान है इस वजह से हमेशा लड़कों का पक्ष लिया जाता है। कई ऐसे उदाहरण भी देखने को मिल जाते हैं जो इस बात को सही साबित भी कर देते हैं। और इन उदाहरणों को देखते देखते हम अपनी सोच में यह बिठा भी चुके हैं कि लड़कियां, महिलाएं अबला होती हैं और पुरूष उनका शोषण करते हैं। समाज में लड़कियों के साथ हो रहे भेदभाव के कारण ही हमारी सरकारों ने भी समय समय पर उनके हित में कई कानून बना डाले हैं। लड़कियां भी इस बात को अच्छी तरह से समझ चुकी हैं कि अब उनके पास कौन कौन से अधिकार हैं और वो उन अधिकारों का प्रयोग कर क्या क्या कर सकती हैं ? लेकिन इन सब का सकारात्मक परिणाम कितना हुआ है यह कह पाना मुश्किल हैं। सरकार के जो कानून महिलाओं को शोषण से बचाते हैं, उनका कितना इस्तेमाल वैसी महिलाएं कर रहीं हैं जो शोषित हैं, यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है। अब दहेज प्रथा उन्मूलन कानून का ही उदाहरण ले लें। आज के वक्त में शायद ही कोई ऐसा हो जिसे दहेज प्रथा से संबंधित कानून की जानकारी न हो। फिर भी अक्सर दहेज के कारण जलती लड़कियों के बारे में समाचार पत्रों और टीवी रेडियो पर देखने या सुनने को मिल जाता है। क्या दहेज के लिए लड़कियों को मारने वाले इस कानून के बारे में नहीं जान रहे हैं ? या जिनकी लड़कियां दहेज के लिए मार डाली जाती हैं, वे इस कानून के बारे में नहीं जान रहे हैं ? ये संभव नहीं जान पड़ता है। अक्सर यह देखा गया है कि समाज के एक अनजाने भय के कारण ज्यादातर ऐसे मामले दबा दिये जाते हैं। लड़कियों को सहने (प्रताडि़त होने) के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। लेकिन अब लड़कियां जागरूक होने लगी हैं। वे इस अत्याचार को भला क्यों सहें ?
महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के बढ़ते ग्राफ ने महिलाओं को एक रक्षात्मक कवच प्रदान कर दी है। अब महिलाएं अपने लिए बनाये गये कानून का सहारा लेने लगी हैं। और अत्याचारियों पर कानून का डंडा बरसाने लगी हैं। लेकिन ये डंडा कई बार बेगुनाहों पर भी बरबस चल पड़ता है। पटना के जिला सत्र न्यायालय के एक प्रतिष्ठित वकील की मानें तो आज कोर्ट में ज्यादातर मामले धारा 498 (दहेज प्रथा) से संबंधित होते हैं। जिनमें अधिकतर मामले फर्जी होते हैं। दहेज प्रथा उन्मूलन कानून ने महिलाओं को इतनी ताकत दे दी है कि अब वे इसका गलत फायदा उठाने लगी हैं। ससुराल वालों को परेशान करने तथा ससुराल में अपनी धौंस बनाये रखने के लिए महिलाएं धड़ल्ले से दहेज प्रथा का मुकदमा दर्ज करवाने लगी हैं। मुकदमे की सच्चाई चाहे जो भी हो, तत्काल तो ससुराल वालों को परेशानी उठानी ही पड़ती है। कई बार तो जेल तक जाने की नौबत आ जाती है।
अब ऐसे में तो यही लगता है कि महिलाएं अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार रही हैं। पहले जहां दहेज उत्पीड़न के मामलों में वर पक्ष के सभी सदस्यों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होता था वहीं अब केवल लड़के पर ही मुकदमा दर्ज किया जाने लगा है। वर पक्ष के लिए यह रियायत सर्वोच्च न्यायालय ने शायद इसी आधर पर दिया होगा कि इन मामलों में सत्यता कम रह गयी है। यह बदलाव यही दर्शा रहा है कि आज की महिलाएं भले ही दहेज उत्पीड़न का डंडा अपने ससुराल वालों को भयभीत रखने के लिए चला रहीं हैं परंतु सच्चाई यह है कि दहेज उत्पीड़न के उन मामलों सच्चाई ही नहीं रह गई है। इससे तो नुकसान फिर से महिलाओं का ही हो रहा है। अब इसे कोई कैसे समझाए ? आज फिर से मुझे वो कहावत याद आ रही है: औरतें ही औरतों की दुशमन होती हैं।।